सफर - राजीव रंजन प्रसाद

Friday, August 10, 2007

मैनें जीना सीख लिया है..

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मैनें जीना सीख लिया है तुमनें सोचा था सुलगता धुवां धुवां होगा बिखर जायेगा खुद्-ब-खुद खुद से राख हो जायेगा बुझेगा जब.. तुमने सोचा न था कि अंब...
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Wednesday, July 25, 2007

मछली की आँखें

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मेरी अमावस्या इस लिये है कि मेरा चाँद मेरी आँखों की बाहों में लिपट गया है और कुछ दीख नहीं पडता सिर्फ मछली की आँखें.. *** राजीव रंजन प्रसाद २...
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Wednesday, July 11, 2007

हर बार

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एकांत ध्यानमग्न बगुला एकदम से ताल के ठहरे पानी पर झपटा पानी भवरें बनानें लगा उसकी परछाई लहरानें लगी वह शांत हुआ पंजे में कुछ न था मछली या कि...
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Monday, July 09, 2007

तस्वीरों को..

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सिर्फ तुम्हारी चंद तस्वीरें मेरे पास हैं और तुम कहीं भी नहीं तुम्हें भूल जाने की कोशिशें तो की हैं लेकिन जला नहीं पाता उन तस्वीरों को एक सो...
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Friday, July 06, 2007

अपना ही कलेजा बुझा लिया..

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मनाओ कि दिवाली है तुम्हारी कि दिल जले.. इस दिलजले के दिल को जला कर की रोशनी आँखों में कुछ धुवां सा गया आँख नम हुई मैनें जो कहा था तो बताओ ये...
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Tuesday, July 03, 2007

चाँद पूनम का और क्षणिकायें

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चाँद पूनम -१ वस्ल की रात पलक मूंद कर पाया मैनें हर तरफ चाँदनी की खुशबू थी आँख जो मेरी खुली, तुमने बन्द की आखें आज पूनम का चांद निकला है मैं...
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Monday, June 25, 2007

कुछ टूट गया है...

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सागर न समाओगे कि कुछ टूट गया है जीता ही जलाओगे कि कुछ टूट गया है.. हँस हँस के किसी कोर के अश्कों को रौंद कर क्या क्या न बताओगे कि कुछ टूट गय...
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Friday, June 22, 2007

उजालों नें डसा

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हर किरन चाहती है कि हाथ थाम ले मेरा और मैं अपने ही गिर्द अपने ही बुने जालों में छटपटाता चीखता/निढाल होता और होता पुनः यत्नशील अपनी ही कैद से...
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Thursday, June 21, 2007

मैं मोम नहीं हूँ..

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पूरी रात पिघलता रहा हूँ समूचा दिन जम कर थमा रहा एक हलकी सी चिन्गारी एक ठंडी बर्फ सा अहसास दोनों ही की कशमकश जीनें नहीं देती.. बोलो कि अपना प...
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Monday, June 18, 2007

मछली और क्षणिकायें..

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मछली -१ मुझे पानीं से निकाल कर यूं हथेली पर न रखो जानम तुममें डूबा हुआ ही ज़िन्दा हूं मैं.. मछली -२ मेरी सोन मछली मेरी जल परी यूं डुबक पानी म...
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Friday, June 15, 2007

ज़ुल्फ और क्षणिकायें

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ज़ुल्फ -१ उसनें कहा था हवाओं में खुश्बू भरी होगी मुझसे दूर मेरे ज़ुल्फों के खत पुरबा सुनायेगी तुम्हे ये क्या कि ज़हर घुला है हवाओं में एक तो जु...
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Wednesday, June 13, 2007

मासूम जख्म..

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जैसे गिलहरी कुतरती है दाने मासूमियत से, बहुत हौले तुमने सिर्फ छिलकों सा कर दिया है मन.. कितनी भोली तुम्हारी आँखों का मुझको जो चीर गया था सा...
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Monday, June 11, 2007

अगर आदमी नहीं होता

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तुमने मुझको गलत तराशा है मैं गुलाब की पंखुडी होता या कि ताज के संगमरमर का टुकडा कोई या कि बादल.. मोर का पंख हो गया होता या कि उसकी पलकों में...
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Sunday, June 10, 2007

नाउम्मीदी..

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पेड के बिलकुल उपर की फुनगी पर बैठी खमोशी मेरी निगह से अनबोली सी देखती रही एकटक ओह कि ये अनबोला खलबला देता है मुझे कि तुम्हारी बडी बडी आखें ...
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Friday, June 08, 2007

नींद और क्षणिकायें

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नींद -१ ख्वाब टूटेंगे कांच की तरह और नंगे पाँव जो चलना होगा ज़िन्दगी फिर लहू लहू होगी मुझको ख्वाबों में और जीनें दो नींद तुम ओढ लो मुझे आ कर...
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Thursday, June 07, 2007

वे स्मृतियाँ..

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वे स्मृतियाँ बिलकुल एसी ही हैं जैसे बोझिलता के बाद चाय की पहली घूंट जैसे गहरी घुटन के बाद एक गहरी स्वांस जैसे आकाश ताकती ज़मीन पर हलकी सी फुह...
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मुस्कुरा दूँ बस..

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खामोश रहने की बात कुछ ऐसे हो कि तुम्हारे होठों पर अपनी उंगली रख कर अपनी आखों को, तुम्हारी पलकों पर ठहर जाने दूं.. और खामोशी यूं टूटे कि मेरी...
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Thursday, May 24, 2007

तुम्हारा खत...

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तुम्हारा खत पढा फिर पढा कितने ही टुकडे चाक कलेजे के मुँह को आ पडे थामा ज़िगर को और बिलकुल बन चुका मोती भी चूने न दिया फिर पढा तुमहारा खत और ...
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Wednesday, May 23, 2007

तरक्की

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सभ्यता व्यंग्य से मुस्कुराती है जंगल के आदिम जब "मांदर" की थाप पर लय में थिरकते हैं जूडे में जंगल की बेला महकती है हँसते हैं, गुच्...
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Monday, April 30, 2007

वही रास्ता..

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मुझे मौत ही की सजा मिले। मुझे गम के फंदे में झोल कर, तुझे मुस्कुराने की बात हो मुझको कबूल फिर रात है। मुझे उफ न करने का दम्भ है मुझे नश्तरों...
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कलम...

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राजीव रंजन प्रसाद
बचेली (दंतेवाडा), छत्तीसगढ), India
स्वयं से अपरिचित हूँ, अपनी तलाश जारी है.
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