गुजरा हुआ जमाना जिस पेड पर टंगा था बंदर वहाँ बहुत थे कुछ पोटली से उलझे मिल गाँठ खोल डाली पर हिल गयी जो डाली पल झर गये नदी में घुट मर गये नदी में अब जल रही नदी है मैं रिक्त हो गया हूँ..
बहुत खूब, गुज़रे ज़माने की गर्मी और बेचैनी, गर नदी के हिस्से गयी तो बदारों का बन्दर होना सार्थक हो गया, की जो दर्द समंदर के लायक था वह व्यर्थ ही पेड़ पे टंगा था।
राजीव जी कुछ अनूठी उपमाओं से रचित आप की ये रचना सच में अद्भुत है. आप के पास शब्द और भाव का जो खजाना है वो गर्व करने योग्य है. कमाल के बिम्ब बना कर उनका क्या खूबसूरती से प्रयोग करते हैं की मन गदगद हो जाता है. इश्वर आप की लेखनी को सदा ऐसे ही सबसे जुदा अनूठा और मधुर रखे. नीरज
बहुत खूब,
ReplyDeleteगुज़रे ज़माने की गर्मी और बेचैनी,
गर नदी के हिस्से गयी तो बदारों का बन्दर होना सार्थक हो गया,
की जो दर्द समंदर के लायक था वह व्यर्थ ही पेड़ पे टंगा था।
bahut khoob....aapki ye kavita behad pasand aayi......
ReplyDeleteकुछ पोटली से उलझे
ReplyDeleteमिल गाँठ खोल डाली
पर हिल गयी जो डाली
पल झर गये नदी में
घुट मर गये नदी में
अब जल रही नदी है
मैं रिक्त हो गया हूँ..
judasa andaz bahut khub.
bahut achchee kavita hai--
ReplyDeleteपल झर गये नदी में
घुट मर गये नदी में
अब जल रही नदी है
मैं रिक्त हो गया हूँ..
man ke gahre tal se ubhari bhaaav abhivyakti!
पल झर गये नदी में
ReplyDeleteघुट मर गये नदी में
अब जल रही नदी है
मैं रिक्त हो गया हूँ..
बहुत सुंदर.
waah! kitni anokhi baat hai..yaqeenan mehsuus ki hui
ReplyDeleteराजीव जी
ReplyDeleteकुछ अनूठी उपमाओं से रचित आप की ये रचना सच में अद्भुत है. आप के पास शब्द और भाव का जो खजाना है वो गर्व करने योग्य है. कमाल के बिम्ब बना कर उनका क्या खूबसूरती से प्रयोग करते हैं की मन गदगद हो जाता है. इश्वर आप की लेखनी को सदा ऐसे ही सबसे जुदा अनूठा और मधुर रखे.
नीरज
बहुत सशक्त अभिव्यक्ति. बधाई.
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