जब आहिस्ता-आहिस्ता
थमने लगेगी दिल की धडकन
और मैं पिघल जाउंगी
तुम्हारी ही कोख के भीतर
तुम्हारी आँख में आँसू तो न होगा?
आँखें बंद करो माँ
अपने ही जीवन को केनवास समझो
एक चित्र रचो मेरा
रंग भरो कल्पना के सारे
देखो मैं पंछी हूँ, सुन लो मैं गाती हूँ
छू लो मैं पंखुडी गुलाब की
मखमल सी सुबहा हूँ, गुलाबी शाम सलोनी
महसूस करो सतरंगी रंगों को सपनों में
महसूस करो मुझे...
एक बार मेरा चित्र खींच, रंग भर देखो
हलकी सी मुस्कुराहट होठों पर आयेगी,
शबनम को पलकों पर आनें मत देना
मेरी मौत से पहले, एक बार
अपने ही जीवन को केनवास समझो
एक चित्र रचो मेरा...
*** राजीव रंजन प्रसाद

विषय बहुत सशक्त है परंतु उसकी मृत्यु के लिए केवल माँ ज़िम्मेदार नही.. एक घटिया सोच से ग्रसित समाज ज़िम्मेदार है.. आपका प्रयास अच्छा है..
ReplyDeletebhavpurn kavita....maa ki jagah kuch aor shabd lete to....
ReplyDeleteDil ko chhoone waali..
ReplyDeleteएक अजन्मी कली की पुकार को आपने सही लफ्जों में बाँधा है राजीव जी ..
ReplyDeleteआँखे नम सी हो गई हैं.
ReplyDeleteक्या कहूँ?
bahut hi marmsprashi kavita,nanhi titli ka dil hi khol ke rakh dia,maa ko rona to aayega hi,bahut badhai
ReplyDeleteजो मार दे वो माँ ही कहाँ हुई ?
ReplyDeleteBahut samvendansheel hai ye Kavita, aaj ke is sach ne mano humari ek manyta ko khandit kar dia hai , hum kahte the "Poot sapoot sune hain lekin mata nahi kumata"
ReplyDeleteभावुक कर देने वाली रचना.
ReplyDeleteबहुत ही संवेदनशील, एक ऐसा विषय जिसका नाम सुनते ही दिल पिघल जाता है और फिर राजीव रंजन के शब्दों को भावों में पिरोना - दिल को ना छुए, यह कैसे हो सकता है। बहुत ही मार्मिक रचना जो
ReplyDeleteकाफ़ी देर तक मस्तिष्क को झंझोड़े देती है।
बधाई!
राजीव जी
ReplyDeleteइतने सुन्दर चित्र के साथ आपकी यह कविता दिल के आर-पार हो गई। सच में पढ़कर दिल काँप उठा। हम सब जानते हैं, समझते हैं । पता नहीं यह सब कब तक चलेगा? इसका परिणाम है कि बालिकाओं की संख्या दिन पर दिन कम होती जा रही है। एक दिल को छू लेने वाली सशक्त रचना के लिए हृदय से बधाई।