तुम्हारे इन्तज़ार में एक उम्र गुज़ार दी मैनें मुझे अब पुनर्जन्म का यकीन हो चला है
क्योंकि न मैं जीता रहा
न जी सके हो तुम मुझसे दूर..
एक उम्र खामोशियों की जो गुजरती है अब
कभी तो हमें जिला जायेगी
तुम्हारे क़रीब ही मेरी रूह को साँस आयेगी..
***राजीव रंजन प्रसाद
२०.११.१९९६
तुम्हारे इन्तज़ार में एक उम्र गुज़ार दी मैनें मुझे अब पुनर्जन्म का यकीन हो चला हैक्योंकि न मैं जीता रहान जी सके हो तुम मुझसे दूर..
ReplyDeleteराजीव जी इन पंक्तियों में चेतना है
बहुत खूब...
ReplyDeleteपुनर्जन्म का यकीन हो चला हैक्योंकि न मैं जीता रहा ,na जी सके हो तुम मुझसे दूर..
ReplyDeletebahut kuchh kah jaati hain thode shbdon mein ye panktiyan!
क्योंकि न मैं जीता रहा
ReplyDeleteन जी सके हो तुम मुझसे दूर..
क्या बात है .... जो कहना रह गया.... वो गज़ब ढा गया. वाह !
काफी अच्छा लिखा है पसंद आया.........
ReplyDeleteमुझे अब पुनर्जन्म का यकीन हो चला है
ReplyDeleteक्योंकि न मैं जीता रहा
न जी सके हो तुम मुझसे दूर..
--बहुत खूब, राजीव जी. बड़ी गहरी बात कह गये.
चंद पंक्तियों की इस कविता मे अद्भुत अर्थ भर दिए आपने.
ReplyDeleteभावपूर्ण रचना.
बधाई.
atisundar,punarjanam par vishas ho gaya hame bhi,ruh ka rishta bada pakka hota hai,its awesome
ReplyDeleteकम शब्दो में गहरी बात.. बहुत अच्छे
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