Friday, May 16, 2008

मेरे कतरे कतरे को चाहा था..



उसने मुझको छोड
मेरे कतरे कतरे को चाहा था
उसने कतरा कतरा ले कर
मुझको छोड दिया जीने..

मैं कहता हूँ सागर से
मुझमे डूब मरो कम्बख्त
कलेजा भर जायेगा
मेरी आँखों से तो
सारा झर जायेगा
उसने तो मन की गागर में
ठूस ठूस कर सागर भर कर
मुझको छोड दिया पीने...

मेरा लहू निकाला मुझसे
मेरी आँखें छीन ले गया
मेरे मन की जीभ काट ली
मेरे पंख कुतर डाले
मैं कहता था दिल चिरता है
और कलेजा फट पडता है
कुछ मकडी के जाले दे कर
मुझको छोड दिया सीने...

*** राजीव रंजन प्रसाद
१७.०१.१९९६

3 comments:

  1. राजीव जी
    बहुत सुन्दर कल्पना की है-
    सने मुझको छोड
    मेरे कतरे कतरे को चाहा था
    उसने कतरा कतरा ले कर
    मुझको छोड दिया जीने..
    बधाई स्वीकारें।

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  2. उसने तो मन की गागर में
    ठूस ठूस कर सागर भर कर
    मुझको छोड दिया पीने...

    अच्छी है यह अभिव्यक्ति

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  3. मैं कहता हूँ सागर से
    मुझमे डूब मरो कम्बख्त
    कलेजा भर जायेगा
    मेरी आँखों से तो
    सारा झर जायेगा
    उसने तो मन की गागर में
    ठूस ठूस कर सागर भर कर
    मुझको छोड दिया पीने...


    -वाह!! बहुत उम्दा!! गहरी सोच!

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