
तुम्हारी बोलती हुई आँखें
तुम्हारे सिले होठों से
तुम्हारे सिले होठों से
बगावत कर जाया करती थीं
शाम शरारत से मुस्कुराती थी
और हवा गुदगुदा जाती थी कि "मना लो अब"
और मैं हलकी सी मुस्कान लिये
बस देखता रहा करता था तुम्हें
जब तलक गुस्से से मुठ्ठियाँ भींचे
टूट न पडती थीं तुम मुझ पर...
शाम शरारत से मुस्कुराती थी
और हवा गुदगुदा जाती थी कि "मना लो अब"
और मैं हलकी सी मुस्कान लिये
बस देखता रहा करता था तुम्हें
जब तलक गुस्से से मुठ्ठियाँ भींचे
टूट न पडती थीं तुम मुझ पर...
राजीव रंजन प्रसाद
२३.११.९५
२३.११.९५
खूब कही, राजीव जी !
ReplyDeleteसही है भाई.
ReplyDeleteराजीव जी
ReplyDeleteजितने सुंदर शब्द उतने ही सुंदर भाव...भाई वाह. बधाई.
नीरज
सुंदर अभिव्यक्ति !
ReplyDeleteसुन्दर और चुलबुली सी रचना !!
ReplyDeleteसही है-बढ़िया है-चित्र उभर गया
ReplyDelete:) बहुत ही ज्यादा पसंद आई है यह रचना आपकी राजीव जी
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