Friday, April 20, 2007

रिक्त...



गुजरा हुआ जमाना
जिस पेड पर टंगा था
बंदर वहाँ बहुत थे
कुछ पोटली से उलझे
मिल गाँठ खोल डाली
पर हिल गयी जो डाली
पल झर गये नदी में
घुट मर गये नदी में
अब जल रही नदी है
मैं रिक्त हो गया हूँ..

*** राजीव रंजन प्रसाद
20.04.2007

9 comments:

  1. "पल झर गये नदी में
    घुट मर गये नदी में
    अब जल रही नदी है
    मैं रिक्त हो गया हूँ.."

    बहुत सुन्दर राजीव जी अत्यन्त अद्भुत
    ऐज यूजुअल
    :)
    दुःख है कि सुन नही सका, किन्तु शीघ्र ही सुनूँगा|

    सस्नेह
    गौरव

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  2. जबरदस्त भाव-
    अब जल रही नदी है
    मैं रिक्त हो गया हूँ..

    इतनी छोटी कविता, इतनी गहरी बात। राजीव जी यह आपके ही बस की बात है।

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  3. बहुत बढ़िया ...कविता बहुत अच्छी लगी

    बहुत सुंदर प्रवाह है.

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  4. Anonymous6:13 PM

    कब शब्दों मे बहुत कुछ कह दिया है आपने राजीवजी,

    "अब जल रही नदी है
    मैं रिक्त हो गया हूँ.."

    भावों का यह रूप पसंद आया। बधाई!!!

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  5. बहुत खूब!
    अन्दाज़ अलग है।

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  6. बहुत अच्छी लगी ।
    घुघूती बासूती

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  7. राजीवजी बहुत अच्छी कविता है, छोटे-छोटे शब्द गहरे भाव समेटे हुए हैं।

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  8. आपकी एक कविता के लिए प्रकाशन अनुमति चाहिए। मेरे पास आपका ईमेल आई डी नहीं है कृपया neelimasayshi at gmail dot com पर संपर्क करें या कम से कम अपना आई डी भेज दें।
    बाद में इस कमेंट को मिटा सकते हैं।

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  9. समकालीन कविता का तेवर लिये हुए इस अच्छी कविता के लिए बधाई ।

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