गुजरा हुआ जमाना जिस पेड पर टंगा था बंदर वहाँ बहुत थे कुछ पोटली से उलझे मिल गाँठ खोल डाली पर हिल गयी जो डाली पल झर गये नदी में घुट मर गये नदी में अब जल रही नदी है मैं रिक्त हो गया हूँ..
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"पल झर गये नदी में
ReplyDeleteघुट मर गये नदी में
अब जल रही नदी है
मैं रिक्त हो गया हूँ.."
बहुत सुन्दर राजीव जी अत्यन्त अद्भुत
ऐज यूजुअल
:)
दुःख है कि सुन नही सका, किन्तु शीघ्र ही सुनूँगा|
सस्नेह
गौरव
जबरदस्त भाव-
ReplyDeleteअब जल रही नदी है
मैं रिक्त हो गया हूँ..
इतनी छोटी कविता, इतनी गहरी बात। राजीव जी यह आपके ही बस की बात है।
बहुत बढ़िया ...कविता बहुत अच्छी लगी
ReplyDeleteबहुत सुंदर प्रवाह है.
कब शब्दों मे बहुत कुछ कह दिया है आपने राजीवजी,
ReplyDelete"अब जल रही नदी है
मैं रिक्त हो गया हूँ.."
भावों का यह रूप पसंद आया। बधाई!!!
बहुत खूब!
ReplyDeleteअन्दाज़ अलग है।
बहुत अच्छी लगी ।
ReplyDeleteघुघूती बासूती
राजीवजी बहुत अच्छी कविता है, छोटे-छोटे शब्द गहरे भाव समेटे हुए हैं।
ReplyDeleteआपकी एक कविता के लिए प्रकाशन अनुमति चाहिए। मेरे पास आपका ईमेल आई डी नहीं है कृपया neelimasayshi at gmail dot com पर संपर्क करें या कम से कम अपना आई डी भेज दें।
ReplyDeleteबाद में इस कमेंट को मिटा सकते हैं।
समकालीन कविता का तेवर लिये हुए इस अच्छी कविता के लिए बधाई ।
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